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महाशिवरात्रि - देवों के देव महादेव की आराधना पर्व



महाशिवरात्रि - देवों के देव महादेव की आराधना पर्व

देवों के देव महादेव भगवान शिव-शंभू, भोलेनाथ शंकर की आराधना, उपासना का त्यौहार है महाशिवरात्रि। वैसे तो पूरे साल शिवरात्रि का त्यौहार दो बार आता है लेकिन फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी अर्थात अमावस्या से एक दिन पहले वाली रात को महाशिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार महाशिवरात्रि का यह त्यौहार इस बार 13 फरवरी को मनाया जायेगा। 


महाशिवरात्रि पर क्या हैं मान्यताएं

माना जाता है कि जब कुछ नहीं था अर्थात सृष्टि के आरंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान ब्रह्मा के शरीर भगवान शंकर रुद्र रुप में प्रकट हुए थे। कई स्थानों पर यह भी माना जाता है कि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह भी इसी दिन हुआ था। इसलिये महाशिवरात्रि हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों एवं भगवान शिव के उपासकों का एक मुख्य त्यौहार है। ऐसा भी माना जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा करने, व्रत रखने और रात्रि जागरण करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं एवं उपासक के हृद्य को पवित्र करते हैं। मान्यता यह भी है कि इस दिन भगवान शिव की सेवा में दान-पुण्य करने व शिव उपासना से उपासक को मोक्ष मिलता है। 

पौराणिक कथा

महाशिवरात्रि से जुड़ी हुई कई पौराणिक कथाएं भी काफी प्रचलित हैं। एक ऐसी ही प्रेरणादायक कथा है चित्रभानु की। चित्रभानु नाम का एक शिकारी था। वह जंगल के जानवरों का शिकार कर अपना भरण-पोषण करता था। उसने एक सेठ से कर्ज ले रखा था लेकिन चुका नहीं पा रहा था एक दिन सेठ ने उसे शिव मठ में बंदी बना लिया संयोगवश उस दिन महाशिवरात्रि थी लेकिन इसका चित्रभानु को जरा भी भान न था। वह तल्लीनता से शिवकथा, भजन सुनता रहा। उसके बाद सेठ ने मोहलत देकर उसे छोड़ दिया। उसके बाद वह शिकार की खोज में जंगल में निकल पड़ा। उसने एक तालाब के किनारे बिल्व वृक्ष पर अपना पड़ाव डाल दिया। उसी वृक्ष के नीचे बिल्व पत्रों से ढका हुआ एक शिवलिंग भी था। शिकार के इंतजार में वह बिल्व पत्रों को तोड़कर नीचे फेंकता रहा जो शिवलिंग पर गिरते। कुछ शिवकथा का असर कुछ अंजाने में महाशिवरात्रि के दिन वह भूखा प्यासा रहा तो उसका उपवास भी हो गया, बिल्व पत्रों के अर्पण से अंजानें में ही उससे भगवान शिव की पूजा भी हो गई इस सबसे उसका हृद्य परिवर्तन हो गया व एक के बाद एक अलग-अलग कारणों से मृगों पर उसने दया दिखलाई। इसके बाद वह शिकारी जीवन भी छोड़ देता है और अंत समय उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कहानी का निष्कर्ष है कि भगवान शिव शंकर इतने दयालु हैं कि उनकी दया से एक हिंसक शिकारी भी हिंसा का त्याग कर करुणा की साक्षात मूर्ति हो जाता है। कहानी का एक अन्य सार यह भी है कि नीति-नियम से चाहे न हो लेकिन सच्चे मन से साधारण तरीके से भी यदि भगावन शिव का स्मरण किया जाये, शिवकथा सुनी जाये तो भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और उपासक के सभी सांसारिक मनोरथ पूर्ण करते हुए उसे मोक्ष प्रदान करते हैं।

 

महाशिवरात्रि पर्व पर कैसे करें शिव का पूजन

महाशिवरात्रि के दिन सुबह से ही शिवमंदिरों में श्रद्धालुओं, उपासकों की लंबी कतारें लग जाती हैं। जल अथवा दूध से श्रद्धालु भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। गंगाजल या दूध, दही, घी, शहद और शक्कर के मिश्रण से शिवलिंग को स्नान करवाया जाता है। फिर चंदन लगाकर फूल, फल, बेल के पत्ते अर्पित किये जाते हैं। धूप और दीप से भगवान शिव का पूजन किया जाता है। कुछ श्रद्धालु इस दिन उपवास भी रखते हैं। महाशिवरात्रि को रात्री जागरण भी किया जाता है। कई जगहों पर भगवान शिव का विवाह किया जाता है, उनकी बारात भी निकाली जाती है। माना जाता है कि इस दिन जरुरत मंद लोगों की मदद करनी चाहिये। गाय की सेवा करने से भी इस दिन पुण्य की प्राप्ति होती है।

 

कहां करें शिव का पूजन

वैसे तो किसी भी शिव मंदिर में भगवान शिव की आराधना की जा सकती है। लेकिन किसी निर्जन स्थान पर बने शिव मंदिर की साफ-सफाई कर भगवान शिव की पूजा की जाये तो भगवान शिव शीघ्र मनोकामना पूरी करते हैं।


प्रमुख शिव मंदिर

नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर पर महाशिवरात्रि के दिन भक्तों का भारी जमावड़ा होता है।

इसके अलावा भारत भर में बारह स्थानों पर 12 ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं

सोमनाथ- यह शिवलिंग गुजरात के कठियावाड़ में स्थापित है।

श्री शैल मल्लिकार्जुन- यह मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित है।

महाकाल- उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग हैं माना जाता है कि यहां भगवान शिव ने दैत्यों का नाश किया था।

ओंकारेश्वर ममलेश्वर- यह मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर में नर्मदा नदी के तट पर स्थित है माना जाता है कि पर्वतराज विंध्य कठोर की तपस्या से खुश होकर वरदान देने के लिये स्वयं भगवान शिव यहां प्रकट हुये थे जिससे यहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापित हुआ।

नागेश्वर- गुजरात के द्वारकाधाम के समीप ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित है।

बैजनाथ- यह शिवलिंग बिहार के बैद्यनाथ धाम में स्थापित है इसे भी 12 ज्योतिर्लिंगों में एक माना जाता है।

भीमशंकर- यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र की भीमा नदी के तट पर स्थापित है।

त्र्यंम्बकेश्वर- महाराष्ट्र के नासिक से 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित है यह ज्योतिर्लिंग।

घुमेश्वर- यह ज्योतिर्लिंग भी महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गांव में स्थापित है।

केदारनाथ- हरिद्वार से करीब 150 मील की दूरी पर हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग स्थापित है।

विश्वनाथ- यह बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित है इसलिये इसे विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग कहते हैं।

रामेश्वरम्- मद्रास के त्रिचनापल्ली में समुद्र तट पर यह ज्योतिर्लिंग है। माना जाता है इसे स्वयं भगवान श्री राम ने स्थापित किया था जिस कारण इसका नाम रामेश्वरम् पड़ा।

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