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Maa Shailputri Stotram: नवरात्रि के प्रथम दिन देवी दुर्गा के प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन माँ शैलपुत्री स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि माँ शैलपुत्री हिमालय की पुत्री हैं और इनकी आराधना से जीवन में स्थिरता, शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि जो भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ माँ शैलपुत्री स्तोत्र का पाठ करते हैं, उनके जीवन की बाधाएँ धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं।
माँ शैलपुत्री का वाहन वृषभ है और उनके हाथ में त्रिशूल तथा कमल सुशोभित रहते हैं, जो शक्ति और पवित्रता के प्रतीक हैं। नवरात्रि के पहले दिन इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, आत्मबल और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। इसलिए नवरात्रि में माँ शैलपुत्री स्त्रोतम का विशेष महत्व बताया गया है।
वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
अर्थ - मैं मनोवांछित लाभ प्राप्त करने के लिए, अर्धचन्द्र को अपने मस्तक पर धारण करने वाली, वृषभ (बैल) की सवारी करने वाली, इस जगत की पीड़ा को हरने वाली तथा यशस्विनी माता शैलपुत्री की वंदना करता हूँ।
पूर्णेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥
अर्थ - माँ शैलपुत्री का रूप पूर्णिमा के समान आनंद देने वाला है, वे ही माँ गौरी हैं और इस सृष्टि की मूलाधार हैं। वे नवदुर्गा में प्रथम दुर्गा हैं जिनकी तीन आँखें हैं। मातारानी पीले रंग के वस्त्रों को धारण करती हैं और सिर पर रत्नों से जड़ित मुकुट को पहनती हैं। उन्होंने कई प्रकार के आभूषणों से अपना अलंकार किया हुआ है।
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥
अर्थ - हम सभी आनंदित मन के साथ शैलपुत्री माता की वंदना करते हैं। शैलपुत्री माता इस धरती का सृजन करती हैं और उनका रूप बहुत ही सुन्दर व सबसे रमणीय है। माँ शैलपुत्री कामना करने योग्य, सौंदर्य से युक्त, स्नेह भाव ली हुई, पतली कमर व नितम्बों के साथ हैं।
॥ स्तोत्र ॥
प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
अर्थ - शैलपुत्री माँ नवदुर्गा का प्रथम रूप हैं जो हमें भवसागर पार करवा देती हैं। वे ही हमें धन व वैभव प्रदान कर हमारा उद्धार करती हैं। शैलपुत्री माता को मेरा प्रणाम है।
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
अर्थ - शैलपुत्री मां ही तीनों लोकों की जननी हैं और उनके द्वारा ही हम सभी को आनंद की अनुभूति होती है। सभी स्त्रियों को सौभाग्य प्रदान करने वाली शैलपुत्री माँ को हमारा नमन है।
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥
अर्थ - शैलपुत्री माता इस संसार के सभी प्राणियों की ईश्वरी हैं। वे ही आसक्ति व मोहमाया का नाश कर देती हैं। हम सभी को मुक्ति व भक्ति प्रदान करने वाली शैलपुत्री मां को हमारा प्रणाम है।
माँ शैलपुत्री स्तोत्र का पाठ नवरात्रि के प्रथम दिन या प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से करना चाहिए। सबसे पहले घर के पूजा स्थान को साफ करके माँ शैलपुत्री की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद दीपक, धूप और पुष्प अर्पित करें। श्रद्धा और एकाग्रता के साथ माँ शैलपुत्री का ध्यान करते हुए स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के अंत में माँ से सुख-समृद्धि और शांति की प्रार्थना करें।
माँ शैलपुत्री स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस स्तोत्र के नियमित पाठ से भय, तनाव और नकारात्मकता दूर होती है। भक्तों को मानसिक शांति, साहस और आत्मबल की प्राप्ति होती है। साथ ही परिवार में सुख-समृद्धि और जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।
नवरात्रि के पहले दिन माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि माँ शैलपुत्री की स्तुति करने से साधक की आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है। नवरात्रि में यह स्तोत्र भक्तों को देवी की कृपा प्राप्त करने का विशेष माध्यम माना जाता है।
माँ शैलपुत्री स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से नवरात्रि के पहले दिन किया जाता है। इसके अलावा भक्त प्रतिदिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय भी इसका पाठ कर सकते हैं। शुभ फल प्राप्त करने के लिए शुक्रवार या सोमवार के दिन भी इस स्तोत्र का पाठ करना उत्तम माना जाता है।
माँ शैलपुत्री की पूजा में स्तोत्र का विशेष महत्व माना गया है। स्तोत्र के माध्यम से भक्त देवी की स्तुति करते हैं और अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार स्तोत्र का पाठ करने से पूजा पूर्ण मानी जाती है और देवी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। इससे साधक के जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति आती है।
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