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शनि त्रयोदशी - प्रदोष व्रत कथा व पूजा विधि



शनि त्रयोदशी - प्रदोष व्रत कथा व पूजा विधि

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास में कोई न कोई व्रत, त्यौहार अवश्य पड़ता है। दिनों के अनुसार देवताओं की पूजा होती है तो तिथियों के अनुसार भी व्रत उपवास रखे जाते हैं। जिस प्रकार प्रत्येक मास की एकादशी पुण्य फलदायी बतायी जाती है उसी प्रकार हर के कृष्ण व शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि भी व्रत उपवास के लिये काफी शुभ होती है। एकादशी में जहां भगवान विष्णु की पूजा की जाती है वहीं त्रयोदशी तिथि जिसे प्रदोष व्रत भी कहा जाता है में भगवान शिवशंकर की आराधना की जाती है। मान्यता है कि प्रदोष व्रत का पालन करने से सभी प्रकार के दोषों का निवारण हो सकता है। प्रदोष व्रत प्रत्येक मास की त्रयोदशी को रखा जाता है लेकिन हर त्रयोदशी की पूजा वार के अनुसार की जाती है। प्रत्येक वार की व्रत कथा भी भिन्न है। तो आइये जानते हैं शनिवार के दिन रखे जाने वाले प्रदोष व्रत यानि शनि त्रयोदशी के महत्व, व्रत कथा व पूजा विधि के बारे में।

शनि त्रयोदशी का महत्व

वैसे तो प्रत्येक मास की दोनों त्रयोदशी के व्रत पुण्य फलदायी माने जाते हैं। लेकिन भगवान शिव के भक्त शनिदेव के दिन त्रयोदशी का व्रत समस्त दोषों से मुक्ति देने वाला माना जाता है। संतान प्राप्ति की कामना के लिये शनि त्रयोदशी का व्रत विशेष रूप से सौभाग्यशाली माना जाता है।

शनि त्रयोदशी प्रदोष व्रत कथा

महर्षि सुत जी ने शौनकादि अट्ठासी हजार ऋषियों शनि प्रदोष व्रत की कथा आरंभ इस दोहे से किया-

पुत्र कामना हेतु यदि हो विचार शुभ शुद्ध

शनि प्रदोष व्रत परायण करे सुभक्त विशुद्ध

हे मुनियों शुद्ध एवं मंगलकारी विचार रखने वाले भक्त यदि संतान प्राप्ति के इच्छुक हैं तो उन्हें सच्चे मन व श्रद्धा से शनि प्रदोष व्रत का परायण करना चाहिये। सुत जी बोले हे मुनियों मैं आपको जो कथा सुनाने जा रहा हूं वही कथा भगवान शिव ने देवी सती को सुनाई थी। तो सुनो यह कथा-

बहुत समय पहले की बात है एक नगर में एक बहुत ही समृद्धशाली सेठ रहता था। उसके घर में धन दौलत की कोई कमी नहीं थी। कारोबार से लेकर व्यवहार में सेठ का आचरण सच्चा था। वह बहुत ही दयालु प्रवृति का था। धर्म-कर्म के कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेता। इतनी ही धर्मात्मा पत्नी भी सेठ को मिली थी जो हर कदम पर पुण्य कार्यों में सेठ जी का साथ देती थी। लेकिन कहते हैं भगवान अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं। उनके घर में एक ऐसा दुख था जिसका निदान दांपत्य जीवन के कई बसंत बीतने के बाद भी नहीं हो रहा था। दंपति को इस बात का दुख था कि विवाह के कई साल बीतने पर भी उनकी कोई संतान नहीं है। इसी दुख से पीड़ित दंपति ने तीर्थ यात्रा पर जाने का निर्णय लिया। दोनों गांव की सीमा से बाहर निकले ही थे की मार्ग में बहुत बड़े प्राचीन बरगद के नीचे एक साधु को समाधि में लीन हुआ देखते हैं। अब दोनों के मन में साधु का आशीर्वाद पाने की कामना जाग उठी और साधु के सामने हाथ जोड़ कर बैठ गये। अब धीरे-धीरे समय ढ़लता गया पूरा दिन और पूरी रात सर पर से गुजर गई पर दोनों यथावत हाथ जोड़े बैठे रहे। प्रात:काल जब साधु समाधि से उठे और आंखे खोली तो दंपति को देखकर मंद-मंद मुस्कुराने लगे और बोले तुम्हारी पीड़ा को मैनें जान लिया है। साधु ने कहा कि एक वर्ष तक शनिवार के दिन आने वाली त्रयोदशी का उपवास रखो। तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। तीर्थ यात्रा से लौटने पर सेठ दंपति ने साधु की बतायी विधिनुसार शनि प्रदोष व्रत का पालन करना शुरु किया जिसके प्रताप से कालांतर में सेठानी की गोद हरी हो गई और समय आने पर सेठानी ने एक सुंदर संतान को जन्म दिया।

शनि प्रदोष व्रत विधि

त्रयोदशी का व्रत प्रदोष व्रत कहलाता है। इस व्रत की पूजा प्रदोष काल में होती है इसी कारण इसे प्रदोष व्रत कहा जाता है। सूर्यास्त के बाद और रात्रि से पहले का समय प्रदोष काल का समय होता है। इस व्रत में भगवान भोलेनाथ की पूजा की जाती है। व्रती को त्रयोदशी के दिन प्रात:काल स्नानादि के पश्चात बिल्वपत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप आदि से भगवान शिव की आराधना करनी चाहिये। निर्जल रहकर व्रत रखना चाहिये। सूर्यास्त के पश्चात संध्याकाल में ही पुन: भगवान शिवशंकर की पूजा करनी चाहिये। मान्यता है कि इस व्रत से नि:संतान को भी संतान सुख की प्राप्ति भगवान भोलेनाथ की कृपा से होती है। भगवान शिव की निम्न वंदना भी करनी चाहिये।

हे रुद्रदेव शिव नमस्कार

शिव शंकर जगगुरु नमस्कार

हे नीलकंठ सुर नमस्कार

शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार

हे उमाकान्त सुधि नमस्कार

उग्रत्व रूप मन नमस्कार

ईशान ईश प्रभु नमस्कार

विश्‍वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार

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