कुंडली के योग


कुंडली में योग होना जातक के लिये बहुत ही सौभाग्यशाली माना जाता है। वैसे तो योग शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के माने जाते हैं लेकिन अशुभ योगों को दोष की संज्ञा दी जाती है। इसलिये योग से तात्पर्य यहां शुभ फलदायी संयोगों से है।

किसी भी जातक की कुंडली में जन्म के समय ग्रहों की जो स्थिति होती है। उनमें भावानुसार ग्रहों की स्थिति, ग्रहों की युति, एक दूसरे के भावों पर पड़ने वाली दृष्टि से योगों का सृजन होता है। जातक की जन्मकुंडली में योगों को भाग्योदय का कारण माना जाता है।

आप अपने आस पास देखते होंगे, महसूस भी करते होंगे कि कोई अचानक रातों रात ख्याति प्राप्त कर लेता है। कोई अचानक से धनवान बन जाता है, किसी को उम्मीद नहीं होती लेकिन वह व्यक्ति सत्ता पर काबिज़ हो जाता है। कोई अपनी एक साहित्यिक कृति से साहित्य जगत में अमर हो जाता है तो कोई सिनेमाई पर्दे पर अपनी एक झलक से भी लोगों को अपना मुरीद बना लेता है और रातों रात एक बड़ा सितारा बन जाता है। यह सब जातक की कुंडली में बनने वाले योगों व कारक ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करता है।

कुंडली में प्रचलित योगों के नाम

जातक की कुंडली में अनेक योग बन सकते हैं वैसे तो प्रत्येक ग्रह की दशा, स्थिति, गोचर, ग्रहों की युति एक प्रकार से योग का निर्माण करती है लेकिन कुछ योग जो काफी प्रचलित हैं उनमें से प्रमुख योगों के नाम इस प्रकार हैं।

गजकेसरी योग - यह योग चंद्रमा व गुरु से बनता है। जब चंद्रमा और गुरु किसी जातक की कुंडली में केंद्र में हो तो गजकेसरी योग का निर्माण करते हैं। चंद्रमा और शुक्र के केंद्र में होने पर भी कुछ विद्वान गेजकेसरी योग बताते हैं। यह बहुत ही शुभ योग माना जाता है।

बुधादित्य योग - यह योग सूर्य और बुध की युति पर बनता है जो कि सूर्य व बुध के लगभग साथ-साथ रहने से बना ही रहता है। बुधादित्य योग भी एक शुभ योग माना जाता है।

राज योग - यह योग तब बनता है जब बृहस्पति कर्क राशि में हो व कुंडली के भाग्य स्थान में शुक्र व सप्तम में शनि व मंगल विराजमान हों। ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि ऐसा जातक राजाओं की भांति सुखी जीवन व्यतीत करता है।

हंस योग, केदार योग, चक्र योग, एकावली योग, कारिका योग आदि अनेक प्रकार के योगों का निर्माण ग्रहों की स्थिति करती है।

कुंडली में योग या दोष

कुंडली में ग्रहों की कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं जिनमें ग्रह योग बना रहे हैं या दोष इसे लेकर विभिन्न विद्वानों की राय एक नहीं है। लेकिन अधिकतर इसी बात पर सहमत होते हैं कि एक योग कुछ विशेष परिस्थितियों में दोष बन जाता है (पाप ग्रहों की दृष्टि पड़ने से) तो उसी प्रकार विशेष ग्रह दशा में अभिशाप भी वरदान साबित हो जाता है। नीच भंग राजयोग उन्हीं में से एक है। केमद्रुम योग की गिनती भी ऐसे ही योगों में होती है जो शुभ और अशुभ दोनों तरह से प्रभावी हो सकता है।

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