पितृ पक्ष 2022: श्राद्ध कैसे करें? जानें श्राद्ध तिथि, तर्पण विधि और ज्योतिष उपाय

bell icon Fri, Sep 09, 2022
टीम एस्ट्रोयोगी टीम एस्ट्रोयोगी के द्वारा
कब से शुरू हो रहे हैं पितृपक्ष 2022, क्या है इनका महत्व?

हिंदू पंचाग के अनुसार भाद्रपक्ष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से पितृपक्ष की शुरूआत होती है। पितृपक्ष में पुरखों की आत्मा की शांति के लिए दान और तर्पण किया जाता है। पितृ पक्ष के 15 दिनों में लोग अपने पूर्वजों का आशीर्वाद पाने के लिए उनका विधिवत श्राद्ध कर्म करते हैं।

हिंदू धर्म में माता-पिता, घर के बड़ों का सम्मान और निष्ठापूर्वक उनकी सेवा करना किसी पूजा से कम नहीं है। माता-पिता जब तक संसार में हैं तब तक ही नहीं बल्कि संसार से जाने के बाद यानी उनकी मृत्यु के बाद भी वह पुरखों के रूप में देव तुल्य माने जाते हैं। मान्यताओं के अनुसार अपने पुरखों की आत्मा को शांति व मुक्ति प्रदान करने के लिए लोग श्राद्ध करते हैं। हर वर्ष भाद्रपक्ष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक पितृ पक्ष मनाया जाता है। 

हमारे पुराणों में भी इन दिनों का काफी महत्व बताया गया है। पितृपक्ष में कई कामों को करना वर्जित माना जाता है। किसी भी प्रकार का शुभ कार्य जैसे- विवाह, मुंडन, उपनयन, नामकरण आदि इस दौरान नहीं किये जाते  हैं। वहीं, इस दौरान नया मकान या वाहन भी नहीं खरीदना चाहिए। अगर किसी की कुंडली में पितृ दोष है तो उससे मुक्ति पाने के लिए यह समय सबसे अच्छा होता है। इन दिनों में  हर व्यक्ति की  यह कोशिश होती है कि वह अपने पितरों को खुश करके, उनका आर्शीवाद प्राप्त करें। पितृपक्ष में हमारे पुरखों के नाम पर पिंडदान और श्राद्ध करने का महत्व है। भारत के बिहार स्थित 'गया जी' में पिंडदान करना सबसे अच्छा माना जाता है।

कब से शुरू हो रहे हैं पितृपक्ष 2022

साल 2022 में भाद्रपक्ष माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 10 सितंबर को पड़ रही है। इस कारण इस दिन से इस साल के पितृपक्ष की शुरुआत हो रही है। इसी दिन से आश्विन मास भी शुरू होती है। यह पितृपक्ष आश्विन मास की अमावस्या तक चलते हैं। इस साल आश्विन मास की अमावस्या 25 सितंबर को पड़ रही है। इसे सर्वपितृ अमावस्या कहते हैं। इस वर्ष 2022 में 15 दिनों के पितृपक्ष 10 सितंबर से शुरू होकर 25 सितंबर तक चलेगा। हिंदू कैलेंडर के अनुसार पितृपक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन माह की अमावस्या तक चलते हैं।

श्राद्ध के लिए तिथियां इस प्रकार हैं-

  1. 10 सितंबर 2022 - पूर्णिमा श्राद्ध / प्रतिपदा श्राद्ध

  2. 11 सितंबर 2022 - द्वितीया श्राद्ध

  3. 12 सितंबर 2022 - तृतीया श्राद्ध

  4. 13 सितंबर 2022 - चतुर्थी श्राद्ध

  5. 14 सितंबर 2022 - पंचमी श्राद्ध

  6. 15 सितंबर 2022 - षष्ठी श्राद्ध

  7. 16 सितंबर 2022 - सप्तमी श्राद्ध

  8. 18 सितंबर 2022 - अष्टमी श्राद्ध

  9. 19 सितंबर 2022 - नवमी श्राद्ध

  10. 20 सितंबर 2022 - दशमी श्राद्ध

  11. 21 सितंबर 2022 - एकादशी श्राद्ध

  12. 22 सितंबर 2022 - द्वादशी श्राद्ध

  13. 23 सितंबर 2022 - त्रयोदशी श्राद्ध

  14. 24 सितंबर 2022 - चतुर्दशी श्राद्ध

  15. 25 सितंबर 2022 - अमावस्या श्राद्ध

पितृ पक्ष श्राद्ध, तर्पण नियम

गरुड़ पुराण के अनुसार, पितृ पक्ष में जिन लोगों की माता या पिता अथवा दोनों इस धरती से विदा हो चुके हैं, उन्हें आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से आश्विन अमावस्या तक जल, तिल, फूल से पितरों का तर्पण करना चाहिए। जिस तिथि को माता-पिता की मृत्यु हुई हो, उस दिन उनके नाम से अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन करवाना चाहिए। पितृपक्ष में भोजन के लिए आए ब्राह्णों को दक्षिणा नहीं दी जाती है। जो तर्पण या पूजन करवाते हैं, केवल उन्हें ही इस कर्म के लिए दक्षिणा दें।

माना जाता है कि किसी सुयोग्य विद्वान ब्राह्मण के द्वारा ही श्राद्ध कर्म (पिंड दान, तर्पण) करवाना चाहिए। 

श्राद्ध कर्म में पूरी श्रद्धा से ब्राह्मणों को तो दान दिया ही जाता है। इसके साथ ही यदि किसी गरीब, जरूरतमंद की सहायता भी आप करेंगे तो बहुत पुण्य मिलता है। इसके साथ-साथ गाय, कुत्ते, कौवे आदि पशु-पक्षियों के लिए भी भोजन का एक अंश जरूर डालना चाहिए। यदि संभव हो तो गंगा नदी के किनारे पर श्राद्ध कर्म करवाना चाहिए। यदि यह संभव न हो तो घर पर भी इसे किया जा सकता है। श्राद्ध पूजा दोपहर के समय शुरू करनी चाहिए। योग्य ब्राह्मण की सहायता से मंत्रोच्चारण करें और पूजा के पश्चात जल से तर्पण करें। इसके बाद जो भोग लगाया जा रहा है उसमें से गाय, कुत्ते, कौवे आदि का हिस्सा अलग कर देना चाहिए। इन्हें भोजन डालते समय अपने पितरों का स्मरण करना चाहिए। मन ही मन उनसे श्राद्ध ग्रहण करने का निवेदन करना चाहिए।

पितृपक्ष तर्पण विधि

पितरों को जल देने की विधि को तर्पण कहते हैं। हाथों में कुश लेकर दोनों हाथों को जोड़कर पितरों का ध्यान करना चाहिए और उन्हें आमंत्रित करेंः- ‘ओम आगच्छन्तु में पितर एवं ग्रहन्तु जलान्जलिम’ इस मंत्र का अर्थ है, हे पितरों, पधारिये और जलांजलि ग्रहण कीजिए।

तर्पण पिता को जल देने का मंत्र

अपने गोत्र का नाम लेकर बोलें, गोत्रे अस्मतपिता (पिता का नाम) शर्मा वसुरूपत् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जलं वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः

इस मंत्र को बोलकर गंगा जल या अन्य जल में दूध, तिल और जौ मिलाकर 3 बार पिता को जलांजलि दें। जल देते समय ध्यान करें कि वसु रूप में मेरे पिता जल ग्रहण करके तृप्त हों, ऐसा बोलना है। इसके बाद पितामह को जल जल दें।

तर्पण पितामह को जल देने का मंत्र: अपने गोत्र का नाम लेकर बोलें, गोत्रे अस्मत्पितामह (पितामह का नाम) शर्मा वसुरूपत् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जलं वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः। इस मंत्र से पितामह को भी 3 बार जल दें।

तर्पण माता को जल देने का मंत्र: जिनकी माता इस संसार के विदा हो चुकी हैं उन्हें माता को भी जल देना चाहिए। माता को जल देने का मंत्र पिता और पितामह से अलग होता है। इन्हें जल देने का नियम भी अलग है। चूंकि माता का ऋण सबसे बड़ा माना गया है इसलिए इन्हें पिता से अधिक बार जल दिया जाता है। माता को जल देने का मंत्रः- (गोत्र का नाम लें) गोत्रे अस्मन्माता (माता का नाम) देवी वसुरूपास्त् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जल वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः। इस मंत्र को पढ़कर जलांजलि पूर्व दिशा में 16 बार, उत्तर दिशा में 7 बार और दक्षिण दिशा में 14 बार दें।

दादी के नाम पर तर्पण: (गोत्र का नाम लें) गोत्रे पितामां (दादी का नाम) देवी वसुरूपास्त् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जल वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः। इस मंत्र से जितनी बार माता को जल दिया है, उतनी बार दादी को भी जल दें। श्राद्ध में श्रद्धा का महत्व सबसे अधिक है इसलिए जल देते समय मन में माता-पिता और पितरों के प्रति श्रद्धा भाव जरूर रखें। श्रद्धा पूर्वक दिया गया अन्न जल ही पितर ग्रहण करते हैं। अगर श्राद्ध भाव ना हो तो पितर उसे ग्रहण नहीं करते हैं।

श्राद्ध विधि

श्राद्ध में तिल, चावल, जौ, कुश आदि का विशेष महत्व बताया गया है। इसके अलावा इन सब में सबसे ज्यादा तिल और कुश का महत्व होता है। किसी भी मृत व्यक्ति का श्राद्ध उनके पुत्र, उनके भाई या फिर पौत्र, परपौत्र, और महिलाएं भी कर सकती हैं। हालांकि पुराणों में इस बात का स्पष्ट रूप से जिक्र किया गया है कि श्राद्ध का अधिकार केवल योग्य ब्राह्मणों को ही होता है। मान्यता है कि ज्येष्ठ पुत्र या सबसे छोटे पुत्र को ही श्राद्ध कर्म करना चाहिए। अगर बड़ा या ज्येष्ठ दोनों पुत्र इस दुनिया में नहीं हों तब ही मझला बेटा श्राद्ध कर सकता है। 

श्राद्ध पूजा की सामग्री: रोली, सिंदूर, छोटी सुपारी , रक्षा सूत्र, चावल,  जनेऊ, कपूर, हल्दी, देसी घी, माचिस, शहद,  काला तिल, तुलसी पत्ता , पान का पत्ता, जौ,  हवन सामग्री, गुड़ , मिट्टी का दीया , रुई बत्ती, अगरबत्ती, दही, जौ का आटा, गंगाजल,  खजूर, केला, सफेद फूल, उड़द, गाय का दूध, घी, खीर, स्वांक के चावल, मूंग, गन्ना।

त्रिपिंडी श्राद्ध की सामग्री: धूप बत्ती (अगरबत्ती), कपूर, केसर, चन्दन, यज्ञोपवीत, कुमकुम, चावल, अबीर, गुलाल, अभ्रक, हल्दी, आभूषण, नाड़ा, रुई, रोली, सिंदूर, सुपारी, पान के पत्ते, पुष्पमाला, कमलगट्टे, धनिया खड़ा सप्तमृत्तिका, सप्तधान्य, कुशा व दूर्वा, पंच मेवा, गंगाजल, शहद (मधु), शकर, घृत (शुद्ध घी), दही, दूध, ऋतुफल, नैवेद्य या मिष्ठान्न (पेड़ा, मालपुए इत्यादि) इलायची (छोटी), लौंग, मौली, इत्र की शीशी, सिंहासन (चौकी आसन), पंच पल्लव आदि

पार्वण श्राद्ध सामग्री: तिल, जल, चावल, कुशा, गंगाजल आदि का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। वहीं केला, सफेद पुष्प, उड़द, गाय के दूध, घी, खीर, स्वांक के चावल, जौ, मूंग, गन्ना से किए गए श्राद्ध से पितर प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध के दौरान तुलसी, आम और पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाएं और सूर्यदेवता को सूर्योदय के समय अर्घ्य दें। 

नान्दी श्राद्ध सामग्री: दूर्वा या डाभ, दोने या पत्तल, ताम्रपात्र या सराई, दही , रोली , जौ , फल, एक पाद्य पात्र, पात्र में जौ, जल, आदि ।

वार्षिक श्राद्ध पूजन सामग्री: फूल, 1 माला, दूबी, आम पत्ता, 21 नग पान पत्ता, 2 केला पत्ता, तुलसी पत्ता,दोना 1 पैकेट, पत्तल 1 पैकेट ,दूध, दही, हवन, लकड़ी, श्रांखला, देशी कपूर, घी 200 ग्राम, काला तिल 20 , जौ 20 का, धोती 1, 1 लाल कपड़ा, जनेऊ – 2, मौली धागा, 101 वाला पूजन सामग्री पैकेट, चंदन, कुंवारी धागा, नारियल 2 गिला व 1 सूखा, फल, केला, मिठाई, लोंग इलाइची, दिया 7 नग, तेल , बाती,कपास 5, आधा किलो चावल को हल्का गिला होते तक दूध में पकाना है, 16 नग मटकी (गेंद आकार का) + उसके ऊपर का नान्दी ( दिया 16 नग), 16 टुकड़ा गन्ना, 16 टुकड़ा नींबू, 16 टुकड़ा अदरक, 2 पीड़ा, कुश 3 नग आदि। 

कैसे प्राप्त होती है पितरों को श्राद्ध की वस्तुएं ?

कुछ लोगों को यह शंका होती है कि श्राद्ध में समर्पित की गईं वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती है? कर्मों की भिन्नता के कारण मृत्यु के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं। जैसे कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिण्ड से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है? इस शंका का समाधान स्कन्दपुराण में है। एक बार राजा करन्धम ने महायोगी महाकाल से पूछा कि ’मनुष्यों द्वारा पितरों के लिए जो तर्पण या पिण्डदान किया जाता है तो वह जल, पिण्ड आदि तो यहीं रह जाता है फिर पितरों के पास वे वस्तुएं कैसे पहुंचती हैं और कैसे पितरों को तृप्ति होती है? इस पर भगवान महाकाल ने बताया कि विश्वनियन्ता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि श्राद्ध की सामग्री उनके अनुरुप होकर पितरों के पास पहुंचती है। इस व्यवस्था के अग्निष्वात आदि अधिपति हैं । पितरों और देवताओं की योनि ऐसी होती है कि वे दूर से कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा ग्रहण कर लेते हैं और दूर से गायीं गईं स्तुतियों से ही प्रसन्न हो जाते हैं। वे भूत, भविष्य व वर्तमान सब जानते हैं और सभी जगह पहुंच सकते हैं। पांच तन्मात्राएं, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति, इन नौ तत्वों से उनका शरीर बना होता है और इसके भीतर दसवें तत्व के रूप में साक्षात् भगवान पुरुषोत्तम उसमें निवास करते हैं। इसलिए देवता और पितर गन्ध व रसतत्व से तृप्त होते हैं। शब्दतत्व से रहते हैं और स्पर्शतत्व को ग्रहण करते हैं। पवित्रता से ही वे प्रसन्न होते हैं और वर देते हैं।

पितृपक्ष का महत्व

हमारे पुरखे अपना सबकुछ हमको सौंप कर इस दुनिया से विदा लेते हैं। इस कारण हमें भी चाहिए कि हम अपने माता-पिता या अपने बुजुर्गों की मृत्यु के बाद भी उनकी आत्मा की शांति के लिए कुछ करें। पितृ पक्ष में किसी भी शुभ कार्य करने की मनाही होती है, क्योंकि इसके पीछे मान्यता है कि पितृ पक्ष में खुशी का कोई भी कार्य करने से पितरों की आत्‍मा को कष्‍ट होता है। जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है, वे लोग पितृ पक्ष में पितरों को प्रसन्‍न करने के कुछ विशेष उपाय करें तो उनका ये दोष दूर हो सकता है। 

क्यों करते हैं पिंडदान और तर्पण?

पितृ पक्ष में पितरों के निमित्‍त पिंडदान करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। कुछ लोग काशी और गया जाकर अपने पितरों का पिंडदान करते हैं। पितृ पक्ष में ब्रह्म भोज करवाया जाता है और पितरों के निमित्‍त दान-पुण्‍य किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि पितृ पक्ष में श्राद्ध न करने से पितरों की आत्‍मा तृप्‍त नहीं होती है और उन्‍हें शांति नहीं मिलती है। पितृ तर्पण से प्रसन्‍न होकर पितर अपने परिजनों को सुखी और संपन्‍न रहने का आशीर्वाद देते हैं।

हमारे पूर्वजों या परिवार में मृत लोगों की खुशी, शांति और सांत्वना के लिए हमारी हिंदू परंपराओं के अनुसार पितृ पक्ष को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। पितृपक्ष प्रत्येक वर्ष आश्विन माह में आते हैं और इस समय लोग श्राद्ध के दौरान विभिन्न पूजा, अनुष्ठान और पिंडदान करते हैं।ऐसा माना जाता है कि यदि पिंडदान और अनुष्ठान के अनुसार श्राद्ध किया जाए तो पूर्वजों की आत्माएं स्वर्ग में सुखी और शांत रहती हैं। इसका हमारे प्राचीन शास्त्रों व ब्रह्म पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है। बहुत से लोग विशेष रूप से इस समय के दौरान अपने पितृ का श्राद्ध करने के लिए बोधगया जाते हैं और बदले में उनका आशीर्वाद और सुरक्षा प्राप्त करते हैं।

इन उपायों से पायें पितृपक्ष में पितृदोष से मुक्ति

  • पितृपक्ष में प्रतिदिन पूर्वजों के लिए तर्पण करना चाहिए। इसमें जल, जौ और काले तिल सहित पुष्पों के साथ तर्पण करने पितृ प्रसन्न होते हैं और पितृ दोष दूर होता है। 

  • पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि पर उनके नाम श्राद्ध करना चाहिए। इसमें पूर्वजों का मनपसंद खाना बनाकर किसी ब्राह्मण को भोजन जरूर कराना चाहिए। इससे पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

  • पितृ पक्ष में पूर्वजों के नाम पर श्रीमद् भागवत कथा, गीता, गरूड़ पुराण, नारायण बली, त्रिपिंडी श्राद्ध या महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराना उत्तम माना गया है।मान्यता है कि ऐसा कराने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

  • पितृ पक्ष में नियमित रूप से प्रतिदिन पीपल या बरगद के पेड़ पर जल और काले तिल चढ़ाने से भी पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

  • पितृ पक्ष में गया जाकर अपने पूर्वजों या पितरों के नाम श्राद्ध या फिर पिण्डदान करना चाहिए। इससे पितृ शांत होते है और पितृ दोष से मुक्ति भी मिलती है।

  • पितृ पक्ष में पंचबली की श्राद्ध करनी चाहिए। इसमें गाय, कुत्ते, कौवे, देव और चींटी को भोजन कराना चाहिए।

किस दिन करें श्राद्ध ?

  • यदि पितृ की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो तो अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध किया जा सकता है।

  • आकस्मिक या विष से या फिर असमय मृत्यु होने पर चतुर्दशी के दिन श्राद्ध करना चाहिए।

  • ब्राह्मण भोज बहुत महत्वपूर्ण है और आप अपने बजट के अनुसार एक या एक से अधिक ब्राह्मणों के भोज की व्यवस्था कर सकते हैं।

  •  ब्राह्मण भोज के दौरान खीर अवश्य ही परोसी जानी चाहिए।

  •  परिवार के नाम, गोत्र, तिथि और स्थान के साथ मृतक का नाम लेकर ब्राह्मण के साथ संकल्प करना चाहिए।

  • ब्राह्मण भोज के बाद गाय और कौए को भी भोजन कराना चाहिए। माना जाता है कि कौआ आपके दिवंगत बुजुर्गों तक आपका संदेश ले जाने वाला दूत होता है।

  •  यदि श्राद्ध विधि और अनुष्ठान के अनुसार किया जाता है तो परिवार को स्वास्थ्य, बहुतायत, लंबे जीवन, सुख और शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

आइए जानते हैं कि इस वर्ष 2022 में पितृपक्ष का समय सभी 12 राशियों को कैसे प्रभावित करेगा और उन्हें क्या उपाय करने चाहिए।

मेष राशि - मेष राशि के लोगों के लिए पितृ आपको ढेर सारी खुशियां और प्रचुरता प्रदान करेंगे और वे आपके जीवन में अनुग्रह जोड़ेंगे। आप अपने चारों ओर उनकी उपस्थिति और उनके आशीर्वाद को महसूस करेंगे, खासकर जब आप अपने जीवन में कुछ नया और महत्वपूर्ण शुरू करना चाहते होंगे। हमेशा याद रखें कि वे आपको स्वर्ग से देख रहे हैं और हर दिन आपको आशीर्वाद दे रहे हैं।

उपाय - कौवे को भोजन करायें।

वृषभ राशि - वृषभ राशि वालों, आपके पितृ आप हमेशा नजर रखते हैं और आपकी रक्षा करते हैं और उन्होंने आपको पूरी तरह से अपने सुरक्षा घेरे से ढक दिया है। इस कारण आपको कभी अकेला या असुरक्षित महसूस करने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि आपके पितृ वहां से आपकी रक्षा करने साथ ही आपको आशीर्वाद प्रदान करते रहते हैं। उन्हें हर रोज धन्यवाद दें और उन्हें अपनी अच्छी यादों में रखें।

उपाय - गायों को चारा खिलाएं।

मिथुन राशि-  मिथुन राशि के लोग कभी भी उम्मीद नहीं खोते हैं और जानते हैं कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी आपके पितृ आपको निर्देशित करते हैं। जब भी आप खुद को फंसा हुआ या किसी परेशानी में महसूस करते हैं और आप यह नहीं जानते कि इस विशेष स्थिति को कैसे संभालना है या इससे कैसे बाहर निकलना है, तो आपके पितृ आपका मार्गदर्शन करेंगे। वे आपके सपने में आ सकते हैं और आपको संदेश दे सकते हैं या किसी अन्य तरीके से संदेश भेज सकते हैं, लेकिन वे आपके जीवन में आशा की किरण जरूर दिखायेंगे।

उपाय - ब्राह्मणों को भोजन करायें।

कर्क राशि -  कर्क राशि वालों, यदि इस समय आपके जीवन में कोई अनसुलझी समस्या है और कुछ सवालों के जवाब नहीं मिल पा रहे हैं तो आपके लिए सबसे अच्छी सलाह यह है कि आप कोशिश करें और अपने पूर्वजों का स्मरण करें। इसके साथ ही उनसे आपका मार्गदर्शन करने और आपको सलाह देने के लिए प्रार्थना करें। इससे आपके जीवन में एक चमत्कार होगा क्योंकि आपके पूर्वज विभिन्न संदेशों के माध्यम से आपकी समस्याओं का समाधान बताएंगे।

उपाय - अपने पूर्वजों के नाम पर दान करें।

सिंह राशि -  सिंह राशि वाले जातकों पर उनके पूर्वजों की अपार कृपा होगी और बहुत जल्द परिवार में एक नवजात शिशु के रूप में परिवार का कोई नया सदस्य आएगा। परिवार में यह नया मेहमान आपके ही एक पूर्वज की वापसी हो सकता है, जिसे आप बहुत प्यार करते थे और हमेशा याद करते थे। इस कारण वो आपके जीवन में एक नए रिश्ते के रूप में वापस आएंगे।

उपाय - कुत्तों को भोजन खिलाएं।

कन्या राशि -  कन्या राशि वालों के लिए असुरक्षा के भय और डर को अलविदा कहने का समय है, क्योंकि यूनिवर्स के सितारों के अनुसार इस वर्ष आपके पितृ आपको मजबूत सुरक्षा तंत्र प्रदान करेंगे। इस कारण आप पूरी तरह से अपनी नकारात्मक आशंकाओं को त्याग दें। अब आपको जमीनी रूप से मजबूत, बोल्ड और सुंदर होने की आवश्यकता हैं।

उपाय - ब्राह्मण भोज करायें।

तुला राशि-  तुला राशि वालों के लिए यह समय खुद को फ्री करने का है। हर समय काम के दबाव में खुद को परेशान करने का यह समय नहीं है। हालांकि आपके कंधों पर बहुत सारी जिम्मेदारियां हैं, जिनमें से कुछ की जरूरत भी नहीं है। इस वर्ष आपके पितृ आपको ज्ञान प्रदान करेंगे और आपको चीजों की अधिक कुशलता और स्मार्ट तरीके से देखभाल करने के लिए नये आइडिया प्राप्त होंगे।

उपाय - कुत्ते को भोजन खिलाएं।

वृश्चिक राशि - वृश्चिक राशि वाले जातक अब अकेलापन महसूस नहीं करेंगे क्योंकि बहुत जल्द एक सच्चा जीवनसाथी आपके दिल और आपकी लव लाइफ में आने वाला है। यह आपके सपनों का  राजकुमार या आपके जीवन की रानी होगी। जिसको आपने अपने सपनों में देखा था। याद रखें कि यह एक प्रसाद या आशीर्वाद होगा जो कि आपके पितृ की कृपा से आपको मिलेगा। इस कारण उन्हें अपने दिल के गहराइयों से धन्यवाद दें।

उपाय - वृद्धों या ब्राह्मणों को वस्त्र दान करें।

धनु राशि- धनु राशि के जातक, आप हर समय अपने चारों ओर बहुतायत का अनुभव करेंगे। आप जो कुछ भी स्पर्श करेंगे वह सोने में बदल जाएगा।  जैसे कि आपके पास कोई जादुई शक्ति हो। यह सब केवल उन अच्छे कर्मों के कारण ही संभव होगा जो आपने अपने पितृ को खुश और आप पर गर्व करने के लिए किए थे।

उपाय - कौवे को दाना खिलाएं।

मकर राशि- मकर राशि वालों आप अपना पूरा ध्यान अभी अपने आत्म विकास पर लगाएंगे। जो कि बेहद बुद्धिमानी वाला कार्य है क्योंकि अपने आप पर काम करने से ज्यादा संतुष्टिदायक और फायदेमंद कुछ नहीं है। आपके पितृ आपको सभी आवश्यक सहायता प्रणाली और रसद प्रदान करेंगे, जिससे आपकी यात्रा और पथ बहुत आसान हो जाएगा।

उपाय - गायों को चारा खिलाएं।

कुंभ राशि - कुंभ राशि वालों, अब समय आ गया है कि आप अपना ध्यान अपने स्वास्थ्य पर वापस लाएं और सुनिश्चित करें कि आप बीमार न पड़ें क्योंकि आप काफी समय से अपने शरीर की अनदेखी कर रहे हैं। अगर आप   अभी भी अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखेंगे तो आपको बाद में पछताना पड़ सकता हैं। आपके पितृ आपको आत्म-अनुशासन और आपकी मजबूरियों को नियंत्रित करने के आवश्यक ज्ञान का बोध करायेंगे।

उपाय - वृद्ध और ब्राह्मणों को भोजन कराएं।

मीन राशि -  मीन राशि के लोग इस समय जितनी मेहनत कर सकते हैं, उतनी ही मेहनत करें क्योंकि आपके पितृ आपको देख रहे हैं और उन्हें आपकी कड़ी मेहनत और कौशल पर पहले से ही बहुत गर्व है। इस बार और अच्छा कार्य करके उन्हें और अधिक गौरवान्वित करने का समय आ गया है। 

उपाय - वृद्ध और ब्राह्मणों को वस्त्र दान करें।

हम प्रार्थना करते हैं कि आप सभी को अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त हो।

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✍️ By- टैरो पूजा