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Bhagwan Nandi: शिव मंदिर में प्रवेश करते ही सबसे पहले जिनकी शांत दृष्टि दिखाई देती है, वे हैं नंदी। शिवलिंग के ठीक सामने विराजमान नंदी भगवान शिव के परम भक्त, उनके वाहन और द्वारपाल माने जाते हैं। उनका नाम ही अपने आप में गहरा अर्थ समेटे हुए है- ‘नंदी’ यानी आनंद। यह आनंद बाहरी नहीं, बल्कि भीतर से उपजा हुआ है, जो उनके धैर्य, संयम और निष्ठा में साफ झलकता है। नंदी केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि समर्पण और शक्ति का जीवंत प्रतीक हैं। यही कारण है कि शिव पूजा में उनकी आराधना को विशेष महत्व दिया गया है।
मान्यता है कि भक्त अपनी मनोकामनाएँ भगवान नंदी के माध्यम से शिव तक पहुँचाते हैं, इसलिए लोग उनके कान में मन की बात कहते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान नंदी ऋषि शिलाद के पुत्र थे। उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपने गणों का प्रमुख और वाहन बनने का वरदान दिया। नंदी की यह भूमिका आज भी शिव भक्ति की मूल भावना को दर्शाती है।
नंदी भगवान को अगर ध्यान से देखा जाए तो वे केवल पत्थर की मूर्ति नहीं लगते, बल्कि किसी जीवंत भावना जैसे प्रतीत होते हैं। शिवलिंग के सामने बैठे नंदी मानो समय को थामे हुए हों। न कोई जल्दबाज़ी, न कोई हलचल, बस एक गहरा ठहराव। यही उनका स्वभाव है। वे भगवान शिव के वाहन हैं, लेकिन इस पहचान से कहीं आगे बढ़कर नंदी सेवा और निष्ठा की मिसाल हैं। शिव के गणों में उनका स्थान सबसे आगे इसलिए है, क्योंकि उन्होंने कभी अधिकार नहीं माँगा, केवल समर्पण दिखाया।
मंदिर में आने वाला हर भक्त पहले नंदी के पास रुकता है। कोई सिर झुकाता है, कोई हाथ जोड़ता है और कोई उनके कान के पास जाकर मन की बात कह देता है। यह दृश्य बहुत कुछ कह जाता है। नंदी को भगवान शिव का द्वारपाल माना जाता है, जो भक्त और भगवान के बीच भरोसे की कड़ी बनते हैं।
नंदी भगवान धैर्य का रूप हैं। वे शक्ति हैं, लेकिन शांत शक्ति। ‘नन्दि’ यानी आनंद- वह आनंद जो संतोष से आता है। भगवान शिव और नंदी का संबंध शब्दों से नहीं, विश्वास से बना है, ठीक वैसे ही जैसे गुरु और शिष्य का रिश्ता होता है।
नंदी की कथा भक्ति और तप की उस परंपरा से जुड़ी है, जहाँ विश्वास ही सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। कहा जाता है कि ऋषि शिलाद ने संतान प्राप्ति की कामना से वर्षों तक कठोर तप किया। उनकी तपस्या इतनी सच्ची और गहरी थी कि स्वयं भगवान शिव प्रसन्न हुए। शिव के वरदान से भूमि से एक दिव्य बालक प्रकट हुआ, जिसे नंदी नाम दिया गया। यह कोई साधारण जन्म नहीं था, बल्कि भक्ति से उपजी एक दिव्य घटना थी।
बचपन से ही नंदी का मन शिव आराधना में लगा रहता था। खेल-कूद और संसारिक आकर्षण उन्हें कभी बाँध नहीं पाए। उन्होंने तप, संयम और साधना को ही अपना जीवन बना लिया। नंदी की इस अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें विशेष वरदान दिया- नंदी उनके वाहन बनेंगे, गणों के प्रमुख होंगे और हर शिव मंदिर में उनका स्थान होगा। यह वरदान सम्मान से अधिक सेवा की जिम्मेदारी थी।
नंदी की शक्ति का उल्लेख रावण प्रसंग में भी मिलता है। जब अहंकार में डूबे रावण ने कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास किया, तब नंदी ने अपने पैर से उसे दबा दिया। उस समय रावण को समझ आ गया कि शिव और उनके भक्त की शक्ति के आगे घमंड टिक नहीं सकता।
शिव मंदिर में जाते ही सबसे पहले नजर नंदी पर ही ठहरती है। शिवलिंग के ठीक सामने विराजमान नंदी जैसे हर भक्त का स्वागत करते हैं। यही कारण है कि परंपरा के अनुसार शिव पूजा से पहले नंदी को प्रणाम किया जाता है। माना जाता है कि बिना नंदी की पूजा किए शिव आराधना अधूरी रहती है।
एक लोक आस्था यह भी है कि नंदी के कान में कही गई बात सीधे भगवान शिव तक पहुँचती है। इसी विश्वास के चलते भक्त उनके पास झुककर अपने मन की बात कहते हैं- कोई कामना, कोई चिंता या कोई मन्नत। यह दृश्य किसी औपचारिक पूजा से अधिक आत्मीय संवाद जैसा लगता है।
भगवान नंदी की पूजा हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, बल्कि समर्पण में होती है। नंदी की तरह शांत रहकर, विश्वास के साथ शिव का स्मरण करना ही वास्तविक शिव भक्ति मानी जाती है। उनकी उपस्थिति हर भक्त को धैर्य, सेवा और निष्ठा का मार्ग दिखाती है।
नंदी भगवान केवल भगवान शिव के वाहन या द्वारपाल ही नहीं, बल्कि भक्ति के उस स्वरूप का प्रतीक हैं, जहाँ अहंकार नहीं, केवल समर्पण होता है। शिवलिंग के सामने शांत भाव से बैठे नंदी हमें जीवन की एक बड़ी सीख देते हैं- धैर्य रखो, अपने कर्म में लगे रहो और विश्वास मत छोड़ो। उनकी पूजा हमें यह समझाती है कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग सेवा, विनम्रता और निष्ठा से होकर गुजरता है। आज भी मंदिर में नंदी के पास बैठकर मन की बात कहना मन को सुकून देता है। यही सुकून और भरोसा नंदी की भक्ति की असली पहचान है।