- Home
- Spirituality
- Gods
- Kartikeya
Kartikeya God: आप जानते हैं कि भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े पुत्र कार्तिकेय हिंदू धर्म के सबसे तेजस्वी, वीर और ज्ञान के प्रतीक देवता माने जाते हैं? उन्हें मुरुगन, स्कंद, शिखंडी, सुब्रमण्य, और कार्तिकेय भगवन के नाम से भी पूजा जाता है। वे देवताओं की सेना के सेनापति, युद्ध-विद्या के देवता और साहस के प्रतीक हैं।
भगवान कार्तिकेय की लोकप्रियता भारत के दक्षिणी राज्यों—तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश में विशेष रूप से अधिक है। वहाँ उन्हें भगवान मुरुगन के रूप में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
कथा के अनुसार— प्राचीन काल की बात है। देवताओं और ऋषियों के मन में एक ही चिंता थी—असुरों का बढ़ता अत्याचार। तभी ब्रह्मांड में एक अद्भुत घटना घटी। भगवान शिव के भीतर से एक दिव्य तेज, एक अद्वितीय ऊर्जा प्रकट हुई। यह कोई साधारण प्रकाश नहीं था—यह ऐसा बीज था जिसमें भविष्य के देवसेनापति का स्वरूप छिपा था।
कहानी के अनुसार, तारकासुर नामक राक्षस को एक वरदान प्राप्त था कि उसे केवल शिव के पुत्र द्वारा ही मारा जा सकता है। उस समय शिव तपस्या में लीन थे और संसार में कोई संतान नहीं थी। देवताओं ने भयभीत होकर ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवों से सहायता मांगी, लेकिन समाधान केवल शिव की संतान में ही था।
इस दिव्य बीज को अग्निदेव को सौंपा गया, क्योंकि केवल वही इसकी उष्णता और शक्ति को धारण कर सकते थे। अग्निदेव अपने तेजस्वी रूप में उस बीज को लेकर निकले और उसे शीतलता देने के लिए माता गंगा की शरण में पहुँचे।
गंगा ने उस दिव्य ऊर्जा का आदरपूर्वक स्वागत किया और उसे अपने निर्मल प्रवाह में समेट लिया। धीरे-धीरे वह तेज गंगा की लहरों से होता हुआ एक शांत सरोवर में स्थापित कर दिया गया, जहाँ प्रकृति मानो कुछ अद्भुत घटने की प्रतीक्षा कर रही थी।
कुछ समय बाद सरोवर के भीतर एक दिव्य ज्योति फैली और छह कमलों पर छह सुंदर, दिव्य शिशु प्रकट हुए। वे सभी तेजस्वी, मासूम और अलौकिक आभा से युक्त थे।
जब माता पार्वती उन्हें देखने पहुँचीं, तो उनके मातृहृदय में अद्भुत प्रेम उमड़ पड़ा। उन्होंने उन छहों बालकों को अपने दिव्य आलिंगन में समेट लिया। उसी क्षण एक चमत्कार हुआ—छह बालकों का तेज एक-दूसरे में विलीन होने लगा, और एक दिव्य रूप में समाहित हो गया।
माता के आलिंगन से जन्म हुआ एक ही अद्वितीय बालक का, जिसके छः मुख थे, और जो आगे चलकर देवताओं के सेनापति बने—भगवान कार्तिकेय, षडानन, स्कंद, मुरुगन।
उनका जन्म केवल एक चमत्कार नहीं था, बल्कि देवताओं के लिए आशा, शक्ति और विजय का आरंभ था।
जन्म के कुछ समय बाद ही कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति नियुक्त किया गया। उन्होंने अत्यंत वीरता से युद्ध कर तारकासुर का वध किया और देवताओं को पुनः स्वर्ग का स्वामी बनाया।
एक कथा के अनुसार, उन्होंने ब्रह्मा और शिव जैसे महान देवताओं को “ॐ” का वास्तविक अर्थ समझाया। इसलिए उन्हें ज्ञान और विद्या का अधिपति भी कहा जाता है।
उनका वाहन एक मोर है, जो अहंकार, वासना और लोभ पर विजय का प्रतीक है। मोर के पैरों में लिपटा हुआ साँप उनकी बुद्धि, नियंत्रण और साहस का प्रतीक है।
कार्तिकेय की पूजा जीवन में अनुशासन, साहस और स्पष्टता लाती है।
कार्तिकेय विशेष रूप से उन लोगों के शुभ साथी माने जाते हैं जो जीवन में संघर्षों का सामना कर रहे हों।
यह सबसे लोकप्रिय मंत्र है जो व्यक्ति के भय को दूर करता है और सफलता का मार्ग खोलता है।
यह मंत्र नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास बढ़ाता है।
यह ग्रह दोष, विशेषकर मंगल से संबंधित समस्याओं को दूर करता है।
कार्तिकेय की प्रतिमाओं और चित्रों में उनकी दिव्यता और शक्ति स्पष्ट दिखाई देती है।
उनके छह मुख उनकी सर्वदिशात्मक चेतना, छह इंद्रियों पर नियंत्रण और ज्ञान के छह रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह बताता है कि वे हर दिशा में सत्य को देख और समझ सकते हैं।
उनके हाथ में धारण किया गया वल भाला माता पार्वती द्वारा प्रदान किया गया था। यह भाला तीक्ष्ण बुद्धि, लक्ष्योन्मुखता और अज्ञान विनाश का प्रतीक है।
उनका वाहन मयूर अहंकार, वासना और भ्रम पर विजय का द्योतक है। मयूर के पैरों तले दबा सर्प दर्शाता है कि कार्तिकेय की कृपा से मनुष्य के भीतर के नकारात्मक गुण समाप्त होते हैं।
वे सदैव युवा दिखाई देते हैं। इससे यह संदेश मिलता है कि ऊर्जा, जीवंतता और उत्साह आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण आधार है।
भगवान कार्तिकेय केवल युद्ध के देवता नहीं, बल्कि जीवन का मार्ग दिखाने वाले आध्यात्मिक गुरु भी हैं। उनकी कथा बताती है कि साहस, अनुशासन और ज्ञान किसी भी कठिनाई को जीतने की कुंजी हैं। उनका वल भाला अज्ञान को काटता है, मयूर अहंकार को शांत करता है और उनका दिव्य स्वरूप हर भक्त के मन में आत्मविश्वास जगाता है।
जो भी जीवन में सफलता, संतुलन, शक्ति और स्पष्टता चाहता है, उसे कार्तिकेय भगवान की भक्ति अवश्य करनी चाहिए। उनकी ऊर्जा भक्त को भीतर से जागरूक बनाती है और वह अपने मार्ग पर निडर होकर आगे बढ़ता है।