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Agni Dev: हिंदू धर्म में अग्नि को सिर्फ एक तत्व नहीं माना गया है, बल्कि उन्हें देवता का दर्जा दिया गया है। अग्नि देव की पूजा वैदिक काल से होती आ रही है और उन्हें ऊर्जा, शुद्धता और बदलाव का प्रतीक माना जाता है। आप अपने रोज़मर्रा के जीवन में रसोई की आग, दीपक की लौ या यज्ञ की अग्नि के रूप में जिस आग को देखते हैं, वही अग्नि देव का सांसारिक रूप है। लेकिन शास्त्रों में अग्नि को केवल जलती हुई लौ नहीं कहा गया, बल्कि उन्हें देवताओं और मनुष्यों के बीच संदेश पहुंचाने वाला माध्यम, यज्ञ का मुख्य पुरोहित और ब्रह्मांड की एक महान शक्ति बताया गया है।
ऋग्वेद का पहला ही मंत्र अग्नि देव की स्तुति से शुरू होता है – “अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।” इससे यह साफ होता है कि वैदिक परंपरा में अग्नि देव को यज्ञ का पुरोहित माना गया है, जो मनुष्यों की आहुति को देवताओं तक पहुँचाते हैं। आप जब भी हवन या पूजा में आहुति देते हैं, तो यह माना जाता है कि अग्नि देव उस आहुति को देवताओं तक ले जाते हैं और आपके संकल्प को स्वीकार कराते हैं।
हिंदू शास्त्रों के अनुसार अग्नि देव केवल एक ही रूप में नहीं, बल्कि कई रूपों में विद्यमान हैं। उनके ये अलग-अलग रूप उनके विशाल और सर्वव्यापी स्वभाव को दर्शाते हैं। अग्नि कभी जीवन देने वाली शक्ति बनती है, तो कभी परिवर्तन का माध्यम।
दावानल (वन की अग्नि): यह वह अग्नि है जो जंगलों में फैल जाती है और अपने मार्ग में आने वाली हर चीज़ को जला देती है। दावानल को विनाश का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही यह नए जीवन और पुनर्निर्माण का संकेत भी देती है।
सूर्य अग्नि: सूर्य को अग्नि का सबसे विराट रूप माना गया है। सूर्य की गर्मी और प्रकाश से ही पृथ्वी पर जीवन संभव है। आप जिस ऊर्जा से जीवन चलता हुआ देखते हैं, उसका मूल स्रोत यही सूर्य अग्नि है।
प्रेमाग्नि: भक्ति और प्रेम की भावना को प्रेमाग्नि कहा गया है। संतों और कवियों ने इस अग्नि को आत्मा की वह शक्ति बताया है, जो इंसान को ईश्वर से जोड़ती है और अंदर से शुद्ध करती है।
होम अग्नि: यज्ञ, हवन और विवाह जैसे संस्कारों में जो अग्नि प्रज्वलित की जाती है, उसे होम अग्नि कहा जाता है। यह अग्नि साक्षी बनकर आपके संकल्पों और वचनों को पवित्र बनाती है और उन्हें देवताओं तक पहुँचाने का माध्यम बनती है।
ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।
होतारं रत्नधातमम्॥
ॐ अग्नये नमः॥
ॐ अग्नये स्वाहा॥
अग्नि देव का वाहन मेष (भेड़ / Ram) माना जाता है। कुछ ग्रंथों में उन्हें सात जिह्वाओं वाली अग्नि पर सवार या तोते (पक्षी) के साथ भी दर्शाया गया है, लेकिन मुख्य और प्रचलित वाहन मेष ही है। मेष शक्ति, ऊर्जा और तेज का प्रतीक है। यह अग्नि देव के उग्र, सक्रिय और गतिशील स्वभाव को दर्शाता है। इसलिए हिंदू परंपरा में अग्नि देव को प्रायः मेष वाहन पर विराजमान दिखाया जाता है।
वैदिक ग्रंथों के अनुसार अग्नि देव को ऋषि कश्यप और अदिति का पुत्र माना गया है। अदिति को देवताओं की माता कहा जाता है, इसलिए अग्नि देव भी देवकुल के एक महत्वपूर्ण देव माने जाते हैं। कुछ शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि अग्नि देव स्वयंभू हैं, यानी वे स्वयं प्रकट होने वाले देवता हैं और हर युग में किसी न किसी रूप में प्रकट होते रहते हैं।
अग्नि देव की पत्नी स्वाहा देवी
अग्नि देव की पत्नी का नाम स्वाहा देवी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वाहा देवी ने अपनी बुद्धिमत्ता, समझदारी और सच्चे प्रेम से अग्नि देव का मन जीता था। यही कारण है कि हवन या यज्ञ में जब भी आहुति दी जाती है, तो अंत में “स्वाहा” कहा जाता है। यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि अग्नि देव और स्वाहा देवी के पवित्र संबंध का प्रतीक है। माना जाता है कि “स्वाहा” कहने से आपकी आहुति पूर्ण होती है और अग्नि देव उसे स्वीकार करते हैं।
एक पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि भृगु और उनकी पत्नी पुलोमा से जुड़ी घटना के कारण अग्नि देव को श्राप मिला था कि वे शुद्ध और अशुद्ध, दोनों को भक्षण करेंगे। इस श्राप से अग्नि देव बहुत दुःखी हुए। तब ब्रह्मा ने उन्हें समझाया कि भले ही वे हर वस्तु को जला दें, लेकिन उनकी आंतरिक पवित्रता कभी नष्ट नहीं होगी। इसी कारण अग्नि देव को ‘सर्वभक्षक’ कहा गया, फिर भी हिंदू धर्म में अग्नि को हमेशा पवित्र और देवतुल्य माना जाता है।
एक कथा के अनुसार भगवान शिव से उत्पन्न तेज इतना प्रबल था कि उसे कोई भी संभाल नहीं सका। तब अग्नि देव ने उस तेज को अपने भीतर धारण किया। इसी तेज से आगे चलकर भगवान कार्तिकेय का जन्म संभव हुआ। इस कारण अग्नि देव को कार्तिकेय के दिव्य पालकों में भी गिना जाता है। यह कथा अग्नि देव की सहनशक्ति, जिम्मेदारी और महान शक्ति को दर्शाती है।
अग्नि देव और भगवान शिव का संबंध बहुत गहरा और अर्थपूर्ण माना गया है। शिव के कई रूपों और लीलाओं में अग्नि का विशेष महत्व दिखाई देता है, जो उनके विनाश और पुनर्निर्माण दोनों स्वरूपों को दर्शाता है।
लिंगोद्भव कथा में भगवान शिव अग्निस्तंभ के रूप में प्रकट होते हैं। यह अग्नि का ऐसा विराट रूप होता है, जिसका न तो आदि मिलता है और न ही अंत। इससे शिव की सर्वोच्चता सिद्ध होती है।
कामदेव दहन की कथा में शिव की क्रोधाग्नि से कामदेव भस्म हो जाते हैं। यह अग्नि शिव की शक्ति और संयम को दर्शाती है, जो आवश्यकता पड़ने पर विनाश का रूप ले लेती है।
नटराज स्वरूप में भगवान शिव के चारों ओर अग्नि का घेरा होता है। यह अग्नि सृष्टि और संहार के चक्र का प्रतीक मानी जाती है, जो संसार के संतुलन को बनाए रखती है।
तपस्या के समय शिव के शरीर में उत्पन्न ऊष्मा को तप और साधना की अग्नि कहा गया है। यह अग्नि आत्मसंयम, ध्यान और आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाती है।