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Sita Mata: माता सीता हिंदू धर्म की सबसे पूजनीय देवियों में से एक हैं। वे केवल भगवान श्रीराम की पत्नी ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए त्याग, सहनशीलता, मर्यादा और आत्मबल की जीवंत मिसाल हैं। रामायण जैसे महान महाकाव्य की आत्मा माता सीता ही हैं। जब भी आप रामायण का पाठ करते हैं, तो आपको हर मोड़ पर सीता माता का संघर्ष, धैर्य और नारी शक्ति दिखाई देता है। यही कारण है कि आज भी करोड़ों लोग उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ सीता माता, सीता जी, सीता देवी और माता सीता के नाम से पूजते हैं।
माता सीता का जन्म एक दिव्य घटना के रूप में वर्णित है। वे मिथिला नरेश राजा जनक को हल जोतते समय धरती से प्राप्त हुई थीं। इसी कारण उन्हें भूसुता या भूमिपुत्री कहा जाता है। माता सीता का जन्म वैशाख शुक्ल नवमी के दिन हुआ था, जिसे कई स्थानों पर सीता माता का जन्मदिन या सीता नवमी के रूप में मनाया जाता है। धरती से जन्म लेने के कारण माता सीता में स्वाभाविक रूप से सहनशीलता, स्थिरता और त्याग के गुण दिखाई देते हैं। यही गुण उनके पूरे जीवन में बार-बार प्रकट होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, वे देवी लक्ष्मी का अवतार मानी जाती हैं, जो विष्णु अवतार भगवान श्रीराम के साथ पृथ्वी पर धर्म की स्थापना के लिए आई थीं।
देवी सीता के जन्मस्थान को लेकर भारत और नेपाल, दोनों देशों में गहरी आस्था और अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। नेपाल का दावा है कि मधेश प्रदेश की राजधानी जनकपुर ही माता सीता की जन्मभूमि है। वाल्मीकि रामायण में जनकपुर को सीता के जन्म और विवाह का स्थान बताया गया है। राजा जनक मिथिला के शासक थे, इसी कारण सीता को मैथिली कहा गया। जनकपुर में मैथिली भाषा बोलने वाले लोगों की संख्या अधिक है और वहां सीता-राम के प्रति गहरी श्रद्धा है। यहां स्थित प्रसिद्ध जानकी मंदिर को नेपाल सरकार की पर्यटन वेबसाइट पर भी सीता की जन्मभूमि बताया गया है। मान्यता है कि खेत जोतते समय राजा जनक को सीता कन्या रूप में मिली थीं।
वहीं भारत में बिहार के सीतामढ़ी को माता सीता की जन्मस्थली माना जाता है। सीतामढ़ी के पुनौरा गांव को वह स्थान बताया जाता है, जहां हल के फल (सीत) से टकराकर भूमि से कन्या प्राप्त हुई और उनका नाम सीता पड़ा। वृहद विष्णु पुराण के अनुसार सीता का जन्म जनकपुर से लगभग तीन योजन यानी करीब 40 किलोमीटर दूर हुआ था, जो भारत-नेपाल सीमा की दूरी से मेल खाता है।
आज तक किसी ठोस पुरातात्विक प्रमाण के अभाव में यह विषय आस्था पर आधारित है। फिर भी भारत और नेपाल दोनों ही देशों में सीता-राम के प्रति समान श्रद्धा है और रामायण सर्किट जैसी परियोजनाएं इन पवित्र स्थलों को जोड़ने का प्रयास कर रही हैं।
राजा जनक और माता सुनयना ने सीता जी का पालन-पोषण अत्यंत प्रेम और संस्कारों के साथ किया। मिथिला की राजकुमारी होने के कारण उन्हें मैथिली, जानकी, जनकसुता, वैदेही जैसे नामों से भी जाना जाता है।
इन सभी नामों का एक गहरा अर्थ है। उदाहरण के लिए:
ये नाम केवल पहचान नहीं, बल्कि माता सीता के व्यक्तित्व और जीवन मूल्यों को दर्शाते हैं।
माता सीता का विवाह भगवान श्रीराम से हुआ, जो रामायण की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। राजा जनक ने सीता स्वयंवर का आयोजन किया, जिसमें शर्त रखी गई कि जो शिव धनुष को उठाकर उसका प्रत्यंचा चढ़ाएगा, वही सीता का पति बनेगा। अनेक राजाओं और योद्धाओं के असफल होने के बाद, जब भगवान राम ने सहजता से शिव धनुष तोड़ा, तब सीता जी ने उन्हें अपने वर के रूप में स्वीकार किया।
यह विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य और आदर्श जीवन मूल्यों का संगम था। आप जब इस प्रसंग को पढ़ते हैं, तो आपको समझ आता है कि माता सीता ने हमेशा योग्यता, मर्यादा और धर्म को सर्वोपरि रखा।
भगवान राम को जब 14 वर्षों का वनवास मिला, तब माता सीता ने बिना किसी संकोच के उनके साथ जाने का निर्णय लिया। उन्होंने राजमहल का सुख-सुविधा भरा जीवन छोड़कर वन की कठिनाइयों को स्वीकार किया। यह निर्णय बताता है कि माता सीता केवल एक पत्नी नहीं थीं, बल्कि धर्मपथ पर चलने वाली सशक्त सहचरी थीं।
वनवास के दौरान उन्होंने कष्ट, अभाव और अनिश्चितताओं का सामना किया, लेकिन कभी शिकायत नहीं की। आप उनके इस व्यवहार से सीख सकते हैं कि सच्चा साहस शोर में नहीं, बल्कि धैर्य और संयम में होता है।
रामायण का सबसे पीड़ादायक अध्याय माता सीता के अपहरण से जुड़ा है। रावण ने छलपूर्वक उनका हरण कर उन्हें लंका ले गया और अशोक वाटिका में बंदी बना लिया। इस कठिन समय में भी माता सीता ने अपने आत्मसम्मान और मर्यादा से समझौता नहीं किया।
उन्होंने रावण को स्पष्ट शब्दों में बताया कि वे केवल राम की हैं और रहेंगी। अशोक वाटिका में उनके सामने एक तिनका रखकर उन्होंने रावण को यह संदेश दिया कि कोई भी शक्ति उनके चरित्र को स्पर्श नहीं कर सकती।
यह प्रसंग आज भी नारी सम्मान और आत्मबल का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
लंका विजय के बाद भी माता सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। यह प्रसंग अक्सर चर्चा का विषय बनता है। यहां यह समझना जरूरी है कि माता सीता ने यह परीक्षा स्वयं अपने आत्मबल और सत्य की पुष्टि के लिए दी थी। अग्निदेव ने उन्हें शुद्ध और पवित्र सिद्ध किया, लेकिन इसके बावजूद समाज के प्रश्न समाप्त नहीं हुए।
यह प्रसंग आपको यह सोचने पर मजबूर करता है कि एक आदर्श और पवित्र स्त्री को भी समाज में कितनी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है।
बाद में जब समाज की शंकाएं फिर उठीं, तब माता सीता ने स्वेच्छा से वनवास स्वीकार किया। वाल्मीकि आश्रम में उन्होंने लव और कुश को जन्म दिया और उन्हें संस्कार, धर्म और वीरता की शिक्षा दी। आप यहां देख सकते हैं कि माता सीता ने अकेले रहते हुए भी अपने पुत्रों को ऐसा बनाया कि वे आगे चलकर रामायण के गायक और महान योद्धा बने।
जब माता सीता ने अपने जीवन की सच्चाई सबके सामने रख दी, तब उन्होंने अपनी माता भूमि से उन्हें अपने भीतर समा लेने की प्रार्थना की। धरती फटी और माता सीता उसमें समा गईं। यह अंत नहीं, बल्कि उनके दिव्य स्वरूप में लौटने की कथा है।
यह प्रसंग आपको सिखाता है कि सच्चाई को बार-बार सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती, और आत्मसम्मान सर्वोपरि होता है।
माता सीता को केवल धार्मिक पात्र के रूप में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में भी देखा जाता है। वे बताती हैं कि:
आज भी सीता माता की कहानी महिलाओं और पुरुषों दोनों को जीवन के कठिन क्षणों में सही दिशा दिखाती है।
माता सीता का जीवन आपको कई महत्वपूर्ण जीवन संदेश देता है:
इसी कारण उन्हें युगों-युगों तक पूजनीय माना जाता है।
माता सीता केवल रामायण की एक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। उनका जीवन संघर्षों से भरा होने के बावजूद आदर्शों से परिपूर्ण है। जब भी आप सीता जी, माता सीता, या सीता देवी का स्मरण करते हैं, तो आपको त्याग, शक्ति और मर्यादा की प्रेरणा मिलती है। उनकी कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी हजारों वर्ष पहले थी।