देवशयनी एकादशी 2022 – जानें देवशयनी एकादशी की व्रतकथा व पूजा विधि

bell icon Wed, Dec 22, 2021
टीम एस्ट्रोयोगी टीम एस्ट्रोयोगी के द्वारा
देवशयनी एकादशी 2022 – जानें देवशयनी एकादशी की व्रतकथा व पूजा विधि

साल भर में आषाढ़ महीने की शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक महीने की शुक्ल एकादशी तक यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, दीक्षाग्रहण, ग्रहप्रवेश, यज्ञ आदि धर्म कर्म से जुड़े जितने भी शुभ कार्य होते हैं वे सब त्याज्य होते हैं। इसका कारण यह है कि आषाढ़ महीने की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु चार मास के लिये सो जाते हैं इसलिये इसे देवशयनी और पदमा एकादशी भी कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्री हरि के शयन को योगनिद्रा भी कहा जाता है। आइये जानते हैं देवशयनी एकादशी की कथा और इसके महत्व के बारे में।

 

2022 में देवशयनी एकादशी

साल 2022 में देवशयनी एकादशी 10 जुलाई को है। 

पारण का समय - प्रातः 05:31 से सुबह 08:17 बजे  (11 जुलाई 2022) तक

एकादशी तिथि प्रारंभ – दोपहर 16:39 बजे (09 जुलाई 2022) से

एकादशी तिथि समाप्त – दोपहर 14:13 बजे (10 जुलाई 2022) तक

 

देवशयनी एकादशी व्रत कथा 

देवशयनी एकादशी को पौराणिक ग्रंथों के अनुसार बहुत महत्व दिया जाता है। इसका कारण यही है कि इस दिन भगवान विष्णु चार मास के लिये योगनिद्रा में चले जाते हैं जिस कारण शुभ कार्यों को इस दौरान करने की मनाही होती है। इसके बाद कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी जिसे प्रबोधनी एकादशी कहा जाता है को भगवान विष्णु निद्रा से उठते हैं उसके बाद फिर से शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। देवशयनी एकादशी के महत्व को इस पौराणिक कथा के जरिये और भी अच्छे से समझा जा सकता है हुआ यूं कि एक बार ब्रह्मा जी से देवर्षि नारद ने आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की तब ब्रह्मा जी नारद को इस एकादशी की कथा सुनाने लगे। सतयुग की बात है कि माधांता नाम के चक्रवर्ती सम्राट हुआ करते थे, वह बहुत ही पुण्यात्मा, धर्मात्मा राजा थे, प्रजा भी उनके राज में सुखपूर्वक अपना गुजर-बसर कर रही थी, लेकिन एक बार क्या हुआ कि तीन साल तक लगातार उनके राज्य में आसमान से पानी की एक बूंद नहीं बरसी, खाली सावन आते रहे और धरती की दरारें बढ़ने लगीं। जनता भी भूखों मरने लगी, अब धर्म-कर्म की सुध किसे रहती अपना पेट पल जाये यही गनीमत थी। प्रजा राजा के पास अपना दुखड़ा लेकर जाने के सिवा और कहां जा सकती थी। राजा बेचारे पहले से ही दुखी थे, जनता के आने से उनका दुख और बढ़ गया। अब राजा को न रात को नींद न दिन में चैन हमेशा इसी परेशानी में रहते कि मुझसे ऐसा कौनसा अपराध हुआ जिसका दंड मेरी प्रजा को भोगना पड़ रहा है।

 

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राजा अपनी शंका लेकर वनों में ऋषि मुनियों के पास गया। चलते-चलते वह ऋषि अंगिरा (ब्रह्मा जी के पुत्र) के आश्रम में पंहुच गया। उन्हें दंडवत प्रणाम कर राजा ने अपनी शंका ऋषि के सामने प्रकट करते हुए अपने आने का उद्देश्य बताया। उस समय (सतयुग) में ज्ञान ग्रहण करने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को ही होता था और अन्य वर्णों विशेषकर शूद्रों के लिये तो यह वर्जित था और इसे पाप माना जाता था। ऋषि कहने लगे राजन आपके शासन में एक शूद्र नियमों का उल्लंघन कर शास्त्र शिक्षा ग्रहण कर रहा है। इसी महापाप का खामियाज़ा तुम्हारी सारी प्रजा उठा रही है। प्रजा को इस विपदा से उबारने के लिये तुम्हें उसका वध करना होगा। लेकिन राजा का मन यह नहीं मान रहा था कि वह मात्र शिक्षा ग्रहण करने को ही अपराध मान लिया जाये उन्होंने कहे हे गुरुवर क्या कोई अन्य मार्ग नहीं है जिससे उस निरपराध की हत्या के पाप से मैं बच सकूं। तब अंगिरा ऋषि कहने लगे एक उपाय है राजन। तुम आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी के व्रत का विधिवत पालन करो तुम्हारे राज्य में खुशियां पुन: लौट आयेंगी। राजा वहां से लौट आया और आषाढ़ महीने की शुक्ल एकादशी आने पर व्रत का विधिवत पालन किया। राज्य में जोर की बारिश हुई और प्रजा फिर से धन-धान्य से निहाल हो गई।

 

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एक कथा यह भी

धार्मिक ग्रंथों में यह भी मिलता है कि इसी एकादशी की तिथि को शंखासुर दैत्य मारा गया था जिसके बाद भगवान विष्णु इस दिन से आरंभ करके चार मास तक क्षीर सागर में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। पौराणिक ग्रंथों में एक अन्य कथा के अनुसार यह कहा जाता है कि जब भगवान श्री हरि वामन रुप में दैत्य बलि से यज्ञ में तीन पग दान के रुप में मांगते हैं तो वे पहले पग में वे समस्त दिशाओं सहित संपूर्ण पृथ्वी और आकाश को नाप लेते हैं दूसरे पग में उन्होंनें स्वर्ग को नाप लिया अब तीसरा पग रखने को कुछ भी शेष न बचा तो बलि ने अपना शीष आगे करते हुए निवेदन किया कि प्रभु अपना तीसरा पग मेरे शीष पर रखिये। बलि के इस दान और समर्पण से खुश होकर भगवान विष्णु ने बलि को पाताल का अधिपति बना दिया और वर मांगने को कहा। बलि ने कहा प्रभु आप सदैव मेरे महल में रहें। अब भगवान विष्णु बलि के बंधन में बंध चुके थे ऐसे में माता लक्ष्मी जो कि भगवान विष्णु की भार्या हैं बहुत दुखी हुई उन्होंनें बलि को अनपा भाई बनाया बलि से भगवान को वचनमुक्त करने का अनुरोध किया। तब इसी दिन से भगवान विष्णु वर का पालन करते हुए चार मास तक देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक निवास करते हैं। इसके बाद महाशिवरात्रि तक भगवान शिव और शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक ब्रह्मा जी बलि के यहां निवास करते हैं।

 

देवशयनी एकादशी व्रत व पूजा विधि

  • देवशयनी एकादशी के दिन प्रात:काल उठकर साफ-सफाई कर नित्य कर्म से निवृत हो, स्नानादि के पश्चात घर में पवित्र जल का छिड़काव करें।
  • पूजा स्थल पर भगवान श्री हरि यानि विष्णु जी की सोने, चांदी, तांबे या फिर पीतल की मूर्ति स्थापित करें।
  • इसके बाद षोड्शोपचार सहित पूजा करें। पूजा के बाद व्रत कथा अवश्य सुननी चाहिये।
  • तत्पश्चात आरती करें और प्रसाद बांटे और अंत में सफेद चादर से ढंके गद्दे तकिये वाले पलंग पर श्री विष्णु को शयन कराना चाहिये।

 

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