Vijaya Ekadashi 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की कृष्ण एकादशी को विजया एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इस एकादशी के व्रत से व्रती को हर कार्य में सफलता प्राप्त तो प्राप्त होती ही है साथ ही व्रती को पूर्वजन्म से लेकर इस जन्म के पापों से छुटकारा मिलता है। यानि जैसा इस एकादशी का नाम है वैसा ही फल प्राप्त होता है। तो आइये जानते हैं विजया एकादशी की व्रत कथा व पूजा विधि के बारे में।
हिन्दू पंचांग के अनुसार, फरवरी माह में 13 फरवरी 2026 को विजया एकादशी है। वही अगली आमलकी एकादशी की बात करें तो वह 27 फरवरी 2026 को है।
विजया एकादशी 2026 तिथि - 13 फरवरी 2026, शुक्रवार
पारण का समय - 14 फरवरी 2026, को सुबह: 07:00 से सुबह: 09:14 तक
एकादशी तिथि शुरु- 12 फरवरी, दोपहर 12:22 बजे से,
एकादशी तिथि समाप्त- 13 फरवरी, दोपहर 02:25 बजे तक।
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 05:17 से सुबह 06:08 बजे तक।
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:13 से दोपहर 12:58 बजे तक।
विजय मुहूर्त: दोपहर 02:27 से दोपहर 03:12 बजे तक।
सर्वार्थ सिद्धि योग: सुबह 07:00 से शाम 07:48 बजे तक।
मुनि वकदालभ्य ने जो विधि भगवान श्री राम को बताई वह इस प्रकार है। एकादशी से पहले दिन यानि दशमी को एक वेदी बनाकर उस पर सप्तधान रखें फिर अपनी क्षमतानुसार सोने, चांदी, तांबे या फिर मिट्टी का कलश बनाकर उस पर स्थापित करें। एकादशी के दिन पंचपल्लव कलश में रखकर भगवान विष्णु की मूर्ति की स्थापना करें और धूप, दीप, चंदन, फल, फूल व तुलसी आदि से श्री हरि की पूजा करें। उपवास के साथ-साथ भगवन कथा का पाठ व श्रवण करें और रात्रि में श्री हरि के नाम का ही भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें। द्वादशी के दिन ब्राह्ण को भोजन आदि करवाएं व कलश को दान कर दें। तत्पश्चात व्रत का पारण करें। व्रत से पहली रात्रि में सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिये, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये।
इस प्रकार विधिपूर्वक उपवास रखने से उपासक को कठिन से कठिन हालातों पर भी विजय प्राप्त होती है।
वैदिक मान्यताओं के अनुसार बहुत समय पहले की बात है द्वापर युग में धर्मराज युद्धिष्ठिर को फाल्गुन एकादशी के महत्व के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। उन्होने अपनी शंका भगवान श्री कृष्ण के सामने प्रकट की। भगवान श्री कृष्ण ने फाल्गुन एकादशी के महत्व व कथा के बारे में बताते हुए कहा कि हे कुंते कि सबसे पहले नारद मुनि ने ब्रह्मा जी से फाल्गुन कृष्ण एकादशी व्रत की कथा व महत्व के बारे में जाना था, उनके बाद इसके बारे में जानने वाले तुम्हीं हो, बात त्रेता युग की है जब भगवान श्रीराम ने माता सीता के हरण के पश्चात रावण से युद्ध करने के लिए सुग्रीव की सेना को साथ लेकर लंका की ओर प्रस्थान किया, तो लंका से पहले विशाल समुद्र ने उनका मार्ग रोक लिया। समुद्र में बहुत ही खतरनाक समुद्री जीव थे जो वानर सेना को हानि पंहुचा सकते थे। चूंकि श्री राम मानव रूप में थे इसलिये वह इस गुत्थी को उसी रूप में सुलझाना चाहते थे।
उन्होंने लक्ष्मण से समुद्र पार करने का उपाय जानना चाहा तो लक्ष्मण ने कहा कि हे प्रभु वैसे तो आप सर्वज्ञ हैं फिर भी यदि आप जानना ही चाहते हैं तो मुझे भी स्वयं इसका कोई उपाय नहीं सुझ रहा लेकिन यहां से आधा योजन की दूरी पर वकदालभ्य मुनिवर निवास करते हैं, उनके पास इसका कुछ न कुछ उपाय हमें अवश्य मिल सकता है। फिर क्या था भगवान श्री राम उनके पास पंहुच गये। उन्हें प्रणाम किया और अपनी समस्या उनके सामने रखी। तब मुनि ने उन्हें बताया कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को यदि आप समस्त सेना सहित उपवास रखें तो आप समुद्र पार करने में तो कामयाब होंगे ही साथ ही इस उपवास के प्रताप से आप लंका पर भी विजय प्राप्त करेंगें। समय आने पर मुनि वकदालभ्य द्वारा बतायी गई विधिनुसार भगवान श्री राम सहित पूरी सेना ने एकादशी का उपवास रखा और रामसेतु बनाकर समुद्र को पार कर रावण को प्रास्त किया।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे।
हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।
ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।
ॐ विष्णवे नम:
ॐ हूं विष्णवे नम:
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