सावन का महीना भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इसी समय लाखों शिव भक्त कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं और गंगा से गंगाजल लाकर अपने क्षेत्र के प्रमुख शिव मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ाकर जलाभिषेक करते हैं।
हिन्दू पंचांग के अनुसार, साल 2026 में सावन माह 30 जुलाई से 28 अगस्त 2026 तक रहेगा, लेकिन मुख्य कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से 11 अगस्त 2026 तक रहेगी क्योंकि अधिकतर कांवड़िए सावन शिवरात्रि के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक करके अपनी यात्रा पूर्ण करते हैं।
| पर्व | तिथि |
|---|---|
| सावन मास प्रारंभ / कांवड़ यात्रा शुरू | गुरुवार, 30 जुलाई 2026 |
| कांवड़ यात्रा अवधि | 30 जुलाई – 11 अगस्त 2026 |
| पहला सावन सोमवार | सोमवार, 3 अगस्त 2026 |
| दूसरा सावन सोमवार | सोमवार, 10 अगस्त 2026 |
| मुख्य जलाभिषेक / सावन शिवरात्रि | मंगलवार, 11 अगस्त 2026 |
सावन में कावड़ यात्रा का मुख्य जलाभिषेक 11 अगस्त 2026, मंगलवार (सावन शिवरात्रि) को नीचे दिए मुहूर्त पर किया जाएगा।
सावन शिवरात्रि: मंगलवार, 11 अगस्त 2026
निशिता काल पूजा मुहूर्त: रात 12:05 बजे से रात 12:48 बजे तक (12 अगस्त), अवधि: 43 मिनट
प्रथम प्रहर: शाम 07:04 बजे से रात 09:45 बजे तक (11 अगस्त)
द्वितीय प्रहर: रात 09:45 बजे से रात 12:26 बजे तक (12 अगस्त)
तृतीय प्रहर: रात 12:26 बजे से रात 03:07 बजे तक (12 अगस्त)
चतुर्थ प्रहर: रात 03:07 बजे से सुबह 05:49 बजे तक (12 अगस्त)
शिवरात्रि पारण: 12 अगस्त 2026, सुबह 05:49 बजे के बाद
कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर विभिन्न धार्मिक परंपराएं प्रचलित हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान परशुराम पहले कांवड़िए थे। कहा जाता है कि उन्होंने गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के पुरा महादेव में भगवान शिव का अभिषेक किया और यहीं से कांवड़ लेकर जल चढ़ाने की परंपरा का विस्तार हुआ।
दूसरी मान्यता में भगवान शिव के परम भक्त रावण का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने अपनी भक्ति प्रकट करने के लिए गंगाजल अर्पित किया था। वहीं रामायण की परंपरा में श्रवण कुमार का उदाहरण भी कांवड़ यात्रा से जोड़ा जाता है। उन्होंने अपने माता-पिता को कंधों पर एक डंडे के दोनों सिरों पर टोकरी में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी।
माना जाता है कि इसी प्रकार की संरचना से आगे चलकर "कांवड़" का स्वरूप विकसित हुआ। समय के साथ यह परंपरा पूरे उत्तर भारत में फैल गई और आज सावन के महीने में लाखों शिव भक्त गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हुए इस प्राचीन आस्था को आगे बढ़ाते हैं।
कांवड़ यात्रा श्रद्धालुओं की श्रद्धा, संकल्प और नियमों के अनुसार अलग-अलग प्रकार से की जाती है। सबसे सामान्य रूप साधारण कांवड़ का होता है। इसमें श्रद्धालु गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर रास्ते में विश्राम भी कर सकते हैं। यह कांवड़ यात्रा का सबसे अधिक प्रचलित स्वरूप है।
डाक कांवड़: डाक कांवड़ में श्रद्धालु बिना रुके लगातार यात्रा करते हैं। कई बार यह यात्रा समूह या रिले पद्धति से पूरी की जाती है, ताकि गंगाजल जल्द से जल्द भगवान शिव को अर्पित किया जा सके। इस प्रकार की कांवड़ विशेष रूप से सावन शिवरात्रि के जलाभिषेक के लिए लोकप्रिय मानी जाती है।
खड़ी कांवड़: खड़ी कांवड़ में गंगाजल भरने के बाद कांवड़ को किसी भी स्थिति में जमीन पर नहीं रखा जाता। विश्राम के समय साथी श्रद्धालु कांवड़ को अपने हाथों में संभालते हैं या विशेष स्टैंड का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार की यात्रा में नियमों का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
डंडी कांवड़: डंडी कांवड़ सबसे कठिन और तपस्वी स्वरूप मानी जाती है। इसमें श्रद्धालु पूरी यात्रा या उसके बड़े हिस्से को साष्टांग दंडवत करते हुए तय करते हैं। इस प्रकार की कांवड़ के लिए अत्यधिक धैर्य, शारीरिक क्षमता और अटूट श्रद्धा की आवश्यकता होती है।
कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु अपनी सुविधा और धार्मिक परंपरा के अनुसार अलग-अलग स्थानों से गंगाजल भरते हैं।
हरिद्वार सबसे प्रमुख और सबसे व्यस्त कांवड़ मार्ग माना जाता है। यहां हर की पौड़ी से गंगाजल लेकर कांवड़िए दिल्ली, मेरठ, गाजियाबाद, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और आसपास के कई शिव मंदिरों तक पैदल यात्रा करते हैं।
जो श्रद्धालु कठिन और लंबी यात्रा का संकल्प लेते हैं, वे गौमुख और गंगोत्री से गंगाजल भरते हैं।
पूर्वी भारत में बिहार के सुल्तानगंज से शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व है। यहां से श्रद्धालु उत्तरवाहिनी गंगा का जल लेकर लगभग 105 किलोमीटर पैदल चलकर झारखंड के बाबा बैद्यनाथ धाम, देवघर पहुंचते हैं, जो भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसे पूर्वी भारत का सबसे बड़ा कांवड़ मार्ग माना जाता है।
इसके अलावा प्रयागराज और वाराणसी से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगाजल लेकर उत्तर प्रदेश के विभिन्न शिव मंदिरों में जलाभिषेक करने के लिए यात्रा करते हैं।
इन सभी मार्गों पर सावन के दौरान शिव भक्तों की आस्था, सेवा शिविरों और "बोल बम" के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
कावड़ यात्रा पूरी होने के बाद श्रद्धालु शिव मंदिर पहुंचते हैं और विधि-विधान से भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।
जलाभिषेक के दौरान सामान्यतः ये सामग्री अर्पित की जाती है।
गंगाजल
बेलपत्र
धतूरा
भांग
सफेद फूल
अक्षत
चंदन
इसके बाद "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करते हुए भगवान शिव की पूजा की जाती है।
तुलसी
केतकी का फूल
हल्दी
नारियल पानी
सिंदूर
कांवड़ यात्रा केवल पैदल चलने का नाम नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, अनुशासन और भगवान शिव के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यदि आप कांवड़ यात्रा पर जा रहे हैं, तो इन नियमों और जरूरी बातों का ध्यान रखें।
कांवड़ को जमीन पर न रखें: गंगाजल भरने के बाद कांवड़ को सीधे जमीन पर नहीं रखा जाता। विश्राम के समय कांवड़ स्टैंड का उपयोग करें।
सात्विक भोजन करें: पूरी यात्रा के दौरान सात्विक भोजन ग्रहण करें। मांस, मदिरा, तंबाकू, प्याज और लहसुन का सेवन न करें।
स्वच्छता बनाए रखें: प्रतिदिन स्नान करें और साफ-सुथरे कपड़े पहनें।
भगवान शिव का स्मरण करें: यात्रा के दौरान "बोल बम" और "हर-हर महादेव" जैसे शिव मंत्रों का जाप करते रहें।
संयम रखें: क्रोध, कटु वचन और गलत व्यवहार से बचें तथा सभी श्रद्धालुओं का सम्मान करें।
मौसम के अनुसार कपड़े पहनें: हल्के और आरामदायक कपड़े पहनें ताकि यात्रा में परेशानी न हो।
पर्याप्त पानी पीते रहें: शरीर में पानी की कमी न होने दें।
जरूरी सामान साथ रखें: केवल आवश्यक और हल्का सामान लेकर चलें।
प्रशासन के निर्देशों का पालन करें: तय किए गए मार्ग पर ही यात्रा करें।
भीड़ में धैर्य रखें: जल्दबाजी और धक्का-मुक्की से बचें।
अफवाहों पर ध्यान न दें: केवल प्रशासन और विश्वसनीय स्रोतों की जानकारी पर भरोसा करें।
स्वास्थ्य का ध्यान रखें: यदि तबीयत ठीक न हो, तो यात्रा शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
कांवड़ यात्रा 2026 कब शुरू होगी?
कांवड़ यात्रा 30 जुलाई 2026, गुरुवार से शुरू होगी।
कांवड़ यात्रा 2026 का मुख्य जलाभिषेक कब होगा?
मुख्य जलाभिषेक 11 अगस्त 2026, सावन शिवरात्रि के दिन किया जाएगा।
जल कब का है 2026?
मुख्य जल चढ़ाने की तिथि 11 अगस्त 2026 है।
कांवड़ यात्रा कितने दिनों तक चलती है?
साल 2026 में कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से 11 अगस्त तक चलेगी।
कांवड़ यात्रा में गंगाजल कहां से लाया जाता है?
सबसे अधिक श्रद्धालु हरिद्वार, गौमुख और सुल्तानगंज से गंगाजल भरते हैं।
क्या कांवड़ यात्रा में कोई विशेष नियम होते हैं?
हां। सात्विक भोजन, स्वच्छता, अनुशासन, कांवड़ को जमीन पर न रखना और भगवान शिव का निरंतर स्मरण प्रमुख नियम माने जाते हैं।
कांवड़ यात्रा 2026 भगवान शिव की भक्ति, अनुशासन और आस्था का पावन पर्व है। यदि आप इस यात्रा में शामिल होने की योजना बना रहे हैं, तो पहले से तैयारी करें, यात्रा के नियमों का पालन करें और श्रद्धा के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक करें। मान्यता है कि सच्चे मन से किया गया यह पावन अनुष्ठान भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ माध्यम बनता है।
यदि आप भी इस सावन भगवान शिव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं और अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों का ज्योतिषीय मार्गदर्शन पाना चाहते हैं, तो एस्ट्रोयोगी के अनुभवी ज्योतिषियों से परामर्श कर सकते हैं।






| दिनाँक | Wednesday, 05 August 2026 |
| तिथि | कृष्ण सप्तमी |
| वार | बुधवार |
| पक्ष | कृष्ण पक्ष |
| सूर्योदय | 5:45:0 |
| सूर्यास्त | 19:9:51 |
| चन्द्रोदय | 22:59:39 |
| नक्षत्र | अश्विनी |
| नक्षत्र समाप्ति समय | 21 : 19 : 44 |
| योग | शूल |
| योग समाप्ति समय | 17 : 29 : 12 |
| करण I | विष्टि |
| सूर्यराशि | कर्क |
| चन्द्रराशि | मेष |
| राहुकाल | 12:27:25 to 14:08:02 |